सारू – अगर प्रेम सच्चा हो… सारू एक साधारण-सी लड़की है, लेकिन उसके सपने असाधारण हैं। वह छोटे से शहर में पली-बढ़ी है, जहाँ हर लड़की से यही उम्मीद की जाती है कि वह पढ़-लिखकर चुपचाप शादी कर ले और अपने सपनों को दिल में ही दफ़न कर दे। लेकिन सारू ऐसी नहीं है। उसकी आँखों में आत्मसम्मान है, सवाल हैं और आगे बढ़ने की हिम्मत भी। सारू के पिता एक ईमानदार लेकिन सख़्त इंसान हैं। वे मानते हैं कि लड़की की ज़िंदगी की सबसे बड़ी मंज़िल अच्छी शादी है। वहीं उसकी माँ चुपचाप हर दर्द सहती है और बेटी को समझाती रहती है कि हालात से लड़ना आसान नहीं होता। इन सबके बीच सारू अपने दिल की आवाज़ सुनना चाहती है। दूसरी ओर है वीर — एक पढ़ा-लिखा, समझदार और आत्मनिर्भर युवक। उसका व्यक्तित्व शांत है, लेकिन भीतर गहरी सोच छुपी है। वह रिश्तों को बोझ नहीं, ज़िम्मेदारी मानता है। वीर का मानना है कि प्यार बराबरी से होता है, अधिकार से नहीं। सारू और वीर की पहली मुलाक़ात हालात के कारण होती है। एक सामाजिक कार्यक्रम में, जहाँ सारू अपने पिता के साथ आई होती है। वीर की नज़र सारू पर ठहर जाती है — उसकी सादगी, उसकी आँखों में झलकता आत्मविश्वा...
तुम से तुम तक – आर्य और अनु की कहानी कभी-कभी ज़िंदगी हमें ऐसे मोड़ पर ले आती है, जहाँ उम्र, सोच और हालात के फर्क के बावजूद दिल एक-दूसरे से बात करने लगते हैं। आर्य और अनु की कहानी भी कुछ ऐसी ही है — एक ऐसी प्रेम कहानी, जो समाज की सीमाओं से आगे जाकर सिर्फ़ एहसासों पर टिकी है। आर्य एक परिपक्व, गंभीर और ज़िम्मेदार इंसान है। उसके चेहरे पर हमेशा आत्मविश्वास झलकता है, लेकिन उसकी आँखों में एक अधूरापन भी छुपा है। ज़िंदगी ने उसे बहुत कुछ दिया है — पैसा, इज़्ज़त, मुक़ाम — पर सुकून नहीं। वहीं दूसरी ओर अनु, एक सादगी भरी, मासूम लेकिन आत्मसम्मान से भरी लड़की है। उसकी मुस्कान में निश्चलता है और उसकी आँखों में सपने। वह ज़िंदगी को दिल से जीना जानती है। दोनों की पहली मुलाक़ात अचानक होती है — एक भीड़ भरे बाज़ार में। आर्य अपनी सोच में डूबा हुआ था, और तभी अनु उससे टकरा जाती है। माफ़ी मांगते हुए अनु की नज़र झुक जाती है, लेकिन आर्य की नज़र वहीं ठहर जाती है। उसी पल, बिना कुछ कहे, दोनों के दिलों में कुछ बदल जाता है। अनु के लिए आर्य सिर्फ़ एक अजनबी था, लेकिन आर्य के लिए अनु एक ऐसा एहसास बन गई थी जिसे वह समझ...